इतनी नफरत आई कहाँ से...?
अपनी 32 साल की जिंदगी में से कुछ साल बचपन में तो कुछ साल लड़कपन में गुजारे। जब समझदारी की दहलीज पर कदम रखा तब दुनियादारी समझ में आई। 2010 में पत्रकारिता में कदम रखा तो राजनीति समझ में आई। अब समाज के लोगों को क्या हो गया है ये मेरी समझ में नही आ रहा है। आखिर लोग कौन से स्कूल में नफरत की शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।
आज सुबह मैं ईद की नमाज पढ़ने के लिए घर से निकल रहा था। तभी मेरे पास एक काल आई कि यूपी के अमेठी जिले की मुसाफिरखाना तहसील के गांव बदलगढ़ की ईदगाह में सूअर का सिर काटकर रख दिया है और पुलिस मीडिया को गांव के अंदर घुसने नही दे रही है। हमने ईदगाह में फेंके गए सूअर के कटे सिर के फोटो खींच लिए हैं और वीडियो भी बना लिया है। ये सुनकर मुझे पहली बार जो तकलीफ महसूस हुई वो तकलीफ शब्दों में बयान नही कर सकता। ईदगाह लेपटॉप ले जा नही सकता था और मैं कभी ईदगाह मोबाइल लेकर भी नही गया था। पहली बार ईदगाह मोबाइल लेकर गया और ईदगाह में बैठकर खबर टाइप की। ईदगाह में मोबाइल चलाते हुए एक शख्स ने मुझे टोकने की कोशिश की, लेकिन खबर देखकर वो भी सन्न रह गया।
मैं इस बार ईद की कोई ख़ुशी नही बनाऊंगा। इसलिए मैंने पुराने कपडे पहनकर ईद की नमाज अदा की और आज पूरे दिन सोगवार रहकर घर पर ही रहूँगा। मेरी जिंदगी की पहली ईद है जिसकी मुझे कोई ख़ुशी नही है। इस ईद की ख़ुशी 2019 में मनाऊंगा।
तीन साल से जो देश में नफरत की तिजारत हो रही है। उससे साफ जाहिर है वो चाहते हैं कि आ बैल मुझे मार? साहब ये सब ठीक नही है। हमारे सब्र का और इम्तिहान मत लो। कहते हैं कि सब्र का फल मीठा होता है। हम अल्पसंख्यक हैं कलकत्ता का रसगुल्ला नही जो कोई भी स्वादानुसार गटक जायेगा।
अमन पठान
क्रांतिकारी पत्रकार

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