इस खामोश आंदोलन को मिली बड़ी कामयाबी


मोहम्मद जाहिद
ये क्या हो गया ? मैं समझ नहीं पा रहा हूँ। कैसे हो गया ? विश्वास नहीं कर पा रहा हूँ।

हमें उम्मीद नहीं थी कि हमारी इस मुहिम का असर यह होगा कि देश-विदेश इस तरह दिवानावार इस मुहिम से जुड़ जाएगा कि यह भारतीय इतिहास में मुसलमानों का ईद जैसे त्यौहार पर किया गया प्रतिकात्मक विरोध पूरी दुनिया को अपनी ओर आकर्षित करेगा।

फेसबुक पर बहुत सी पोस्ट हमेशा से वायरल होती रही हैं , बहुत से चित्र वायरल होते हैं पर ज़मीन पर उसका ऐसा प्रभाव ? वह भी पूरे देश और विदेश में एक साथ ? वह भी मात्र 48 घंटे की मुहिम में ? आश्चर्य की परिकाष्ठा है यह।

मुझे अभी तक विश्वास ही नहीं हो पा रहा है।

दरअसल , बल्लभगढ़ में जुनैद के मारे जाने के बाद बेहद दुखी मन से मैंने दोपहर अलविदा जुमे बाद एक पोस्ट की कि (कमेन्ट बाक्स में देखिए)

                  "अब ज़मीन पर उतरना होगा"

उसी पोस्ट पर एक फेसबुक आईडी "ब्रेनलेस ब्रेन" से मुझे सबसे पहले यह सुझाव मिला कि

"ज़ाहिद भाई ईद की नमाज़ हम काली पट्टी बाँध कर विरोध कर सकते हैं"

मैंने इस सुझाव को तुरंत अपनी वाल पर लोगों की प्रतिक्रिया लेने के लिए पोस्ट किया , आप सबकी प्रतिक्रिया सकरात्मक थी।

मैंने अपने हरदिल अजीज़ दोस्त "इमरान प्रतापगढ़ी" को मात्र एक मैसेज किया कि  "हम ऐसा कर सकते हैं ? , ईद पर काली पट्टी बाँध कर विरोध कर सकते हैं कुछ तो करना ही होगा , आपको अब आगे आना होगा।"

फिर इमरान प्रतापगढ़ी से फोन पर बात की , यह व्यक्ति "जुनैद" की खबर के बाद बात करने की स्थिति में ही नहीं था , मैंने कहा इमरान भाई अब कुछ करिए , भर्राई आवाज़ में इमरान भाई  ने कहा "कुछ तो करना ही होगा , अब तो बहुत हो गया।"

और रात में ही इस "खामोश आंदोलन" का नेतृत्व उन्होंने अपने हाथ में ले लिया , अपने पेज पर #EidWithBlackBand की अपील कर दी।

और फिर इमरान प्रतापगढ़ी के फेसबुक पेज पर देश विदेश में फैले 5•25 लाख फालोवर्स ने इस मुहिम को अपने हाथों में ले लिया। अगले दिन से यह मुहिम इमरान भाई के नेतृत्व में शुरु कर दी गयी।  हिन्दूस्तान का कोने कोने से समर्थन मिलने लगा जिसकी गवाह आज की ईद है।

थोड़ा बहुत कोशिशें मैंने भी की उसके बाद का परिणाम अब आपके सामने है।
दरअसल , मेरे फेसबुक पर पिछले 2•5 साल के अनुभव के अनुसार मुस्लिम विषय पर ऐसी चलती हर छोटी बड़ी मुहिम आपसी खींचतान और क्रेडिट लेने के चक्कर में अधर में ही मृत्यु को प्राप्त हुई पर इस बार ऐसा नहीं हुआ।

तो क्युँ नहीं हुआ ?

क्युँकि इस बार हमारे पास इस वक्त देश के मुसलामानों का सबसे विश्वसनीय चेहरा इस खामोश आंदोलन को लीड कर रहा था , देश में मुसलमानों पर ज़ुल्म के विरुद्ध आवाज़ का "ब्रांड अम्बेसडर"

                  "इमरान प्रतापगढ़ी"

जिसके साथ ना कोई फिरका जुड़ा था ना कोई विवाद , सबसे बड़ी बात कि उनका आकर्षक व्यक्तित्व गैर राजनैतिक था।

किसी भी आंदोलन में नेतृत्व की फेसवैल्यू और ब्रांड अम्बेसकर की विश्वनियता सबसे महत्वपूर्ण  होती है।

इमरान पहली बार किसी भी मुहिम को लगातार लीड करते रहे और लोग जुड़ते चले गये।इसके पहले उन्होंने किसी भी मुद्दे पर विरोध करके अपना पक्ष तो रखा पर मुद्दे को लीड करके अंत तक फिनिशिंग टच नहीं किया। इस बार आखीर तक टेम्पो बनाए रखने की नीति पर काम हुआ।

इसका प्रभाव देखिए कि सीएनएन , बीबीसी , आजतक , एनडीटीवी , इंडियन एक्सप्रेस , जनसत्ता , टीवी 18 , टाइम्स आफ इन्डिया , नैशनल दस्तक , सियासत , जनता का रिपोर्टर , पोलिटिकल ऐजेन्डा , माई ज़ाविया जैसी मेन स्ट्रीम मीडिया इस आंदोलन को प्रमुखता से प्रसारित करने के लिए आगे आईं , कुल मिलाकर 63 वेब पोर्टल और वेबसाइट ने इस साइलेन्ट आंदोलन को कवर किया। तमाम इलेक्ट्रानिक न्यूज़ चैनलों ने कवर किया। मुस्लिम मुद्दे का ऐसा कवरेज ? आश्चर्यजनक था।

सबका धन्यवाद

दरअसल हमने या इमरान ने या और सभी दोस्तों ने यह कभी नहीं सोचा था कि हमारी इस मुहिम से रातोरात देश के ज़हरीले हालात से मुक्ति मिल जाएगी।

मिलना भी नहीं था।

हमने यह कभी नहीं सोचा था कि बस यही एक ज़रिया है जो सब कुछ बदल सकता है ,

बदलना भी नहीं था।

हमने यह कभी नहीं सोचा कि और लोग कुछ ना करें  , बस यही एक सही तरीका है जो हम कर रहे हैं।

सिर्फ़ यही एक तरीका था भी नहीं।

हमने कभी यह नहीं सोचा कि बस हम ही कर सकते हैं।

हम अकेले कर भी नहीं सकते हैं। सबका साथ ज़रूरी था जो मिला।

हमने किसी को कुछ करने से रोका भी नहीं। बल्कि अपील की कि जिसे जो तरीका सही लगता है वह अपने तरीके से विरोध करे हम उनके साथ हैं। हम अपने तरीके से प्रयास कर रहे हैं।

नदीम खान भाई के मुहिम का भी समर्थन किया। उनके संगठन ने भी साथ दिया।

सबने किया , आप सबने किया , सोशलमीडिया फोटोज़ से भर दिया , सबने अपने तरीके से भी इस मुहिम को साथ दिया , हमने सबका साथ भी दिया। हमने किसी के तरीके का विरोध भी नहीं  किया।

दरअसल यह मुहिम कुछ करने के लिए थी भी नहीं , यह तो मुसलमानों की एकजुटता दिखाने का एक "लिटमस टेस्ट" था।

यह बस एक प्रतिकात्मक संदेश देने का छोटा सा प्रयास था जो बहुत बड़ा बन गया।

इतिहास बन गया।

हम और आप इस लिटमस टेस्ट में 200% से पास हुए। 100% से हर वर्ग के मुसलमान एक जुट हुए जो भारत में सदैव असंभव होता है और 100% हमारे हिन्दू भाईयों का इस मुहिम में शामिल होना।

एक से एक बेहतरीन कमेन्ट और पोस्ट

सचान जी लिखते हैं

"हे राम इस देश को क्या हो गया कि ईद का खुशियों भरा मीठा त्यौहार मुसलमान काली पट्टी लगा कर मना रहे हैं"

पुनीत विश्वास  12 किमी पैदल चलकर खुद ईदगाह में ईद के नमाज़ियों को रिबन बाँध रहे थे तो हमारे तमाम हिन्दू भाई इसमें साथ दे रहे थे और खुद हाथों में पट्टी बाँध के पोस्ट कर रहे थे हमारा आपका साथ दे रहे थे।

और कुछ मुसलमान ? क्या कर रहे थे ?

इस मुहिम को डिरेल करने की कोशिशें कर रहे थे , हमें और आपको बदनाम कर रहे थे , मुहिम को कवर कर रहीं मीडिया को धमका रहे थे , उन पत्रकारों के विरुद्ध उसी मीडिया हाउस में मेल करा रहे थे।

उनको भी मुबारकबाद और धन्यवाद कि उन्होंने अपने इस घटिया प्रयास से हमारी और आपकी हिम्मत और बढ़ाई।

एक बात समझ लीजिये , मेरा अनुभव है , क्रेडिट लेने के प्रयास से क्रेडिट कभी नहीं मिलती , क्रेडिट मिलती है डेबिट लेने के प्रयास  से।

आज हम यकीं से कह सकते हैं कि ऐसे ही एक आव्हान पर कौम व्यवस्था के विरुद्ध अहिंसात्मक आंदोलन कर सकती है। यह प्रयास इसी की शुरुआत है।

भाई इमरान ने बकरीद तक की चेतावनी दे दी है , स्थिति यदि ऐसे ही रही तो अब विरोध सोशलमीडिया पर या प्रतिकात्मक नहीं बल्कि ज़मीन पर होगा , लोकतांत्रिक तरीके से होगा , अहिंसक होगा , सत्याग्रह होगा , हम पूरे देश में अहिंसात्मक घेराव करेंगे , जन्तर मंतर रामलीला मैदान पर अनशन करेंगे। जो भी लोकतांत्रिक विरोध होगा सब करेंगे।

पूरे भारत में टीम अब तैयार है

सिर्फ 70 दिन बाद यदि यही स्थिति रही तो अब इंशाअल्लाह ऐसे ही पूरे देश में ज़मीन पर हक माँगने की लड़ाई लड़ी जाएगी।

आज सबने आवाज़ दे दी कि "हम एक हैं" , अब एक बार में सबको एक करने वाली आवाज़ हमारे साथ है। उन लोगों से गुजारिश है कि निजी खुन्नस में कौम की लड़ाई को डिस्टर्ब मत करिए।

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