क्या इतना ही जरूरी है अपने धर्म को ऊँचा दूसरे धर्म को नीचा समझना

Nida Rahman की पोस्ट

इतना मुश्किल तो नहीं है अपने मज़हब को मानते हुए दूसरे मज़हब की इज्ज़त करना । क्या ज़रूरी है कि खुद को और खुद के धर्म को अव्वल बताने के लिए किसी दूसरे के मज़हब को उनके देवी-देवताओं उनके महापुरुषों के बारे में गलत बातें की जाएं ।

इतना मुश्किल तो नही है ना कि हम सुकून से रहें । क्या ज़रूरी है कि कोई रसूलल्लाह को  गलत कहे, क्या ज़रूरी है कि हम किसी और की देवी देवताओं का मज़ाक उड़ाए।

धर्म को मानने शर्त ये तो नहीं है ना कि किसी दूसरे धर्म को बुरा भला करें। आस्तिक नास्तिक होने की ये शर्त को कतई नहीं है ना। हम अपनी आस्था अपने विचारों के साथ चैन से रह सकते हैं ना ।

बंगाल में नाबालिग ने मोहम्मद साहब के बारे में भड़का पोस्ट लिख दी तो भाई लोग भड़क गए हैं । लीजिए एक खबर उत्तराखंड के गढ़वाल से आ रही है वहां किसी नाबालिग बच्चे ने केदारनाथ मंदिर की आपत्तिजनक फोटो पोस्ट कर दी है जिसके बाद बजरंगियों ने दुकान में आग लगा दी है ।

इससे हासिल को कुछ नहीं होगा, ये नौजवानों की नसों में धार्मिक उन्माद क्यो भर रहा है । सबसे ज़्यादा चिंता इसी बात की है कि नया खून ज़हरीली हो रहा है । हमें अपने आसपास के नौजवानों को भी समझाने की ज़रूरत है ।

मज़हब को तमाशा ना बनाइए, मज़हब बहुत ही निजी मामला और फ़ैसला है । जिसे जो मानना है उसे मानने दीजिए। हम अपने धर्म का पालन करते हुए दूसरे के मज़हब की इज्जत बहुत आसानी से कर सकते हैं । कोई बॉन्ड नहीं भरा है कि धर्म को गाली देकर अपने को और अपन धर्म को महान बनाया जाए  ।

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